गुरु रविदास जी का जीवन परिचय व जयंती


दोस्तों आप सभी प्यारे दोस्तों को शीतल कनौजिया का नमस्कार , प्रणाम।  9 फरवरी 2020 को गुरु रविदास जी की जयंती है , तो सबसे पहले आप सभी को  गुरु रविदास जी कि जयंती की ढेरों शुभकामनयें !!!. 

दोस्तों हम आप सभी रविदास जी के बारे में बचपन से ही किताबों के माध्यम से पढ़ते आये हैं , थोड़ी बहुत जानकारी हर कोई रखता है।  इस पोस्ट में मैं भी उन्हीं जानकारियों को पुनः दोहरा रही हूँ , लेकिन इस उम्मीद से कुछ नयी जानकारी आप तक पहुँचा सकूँ।  

गुरु रविदास जी कौन थे ?

गुरु रविदास जी भारत वर्ष के उन महान महापुरुषों में से थे जिन्होंने अपनी वाणी , लेख , एवं वचनो  के माध्यम से समाज में फैली कुरूतियों , जाट-पात , ऊंच - नीच इत्यादि को ख़त्म करने में कार्य किया। रविदास जी बहुत ही अच्छे कवि एवं लेखक  थे ,इन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से,अपने अनुयायियों,समाज एवं देश के कई लोगों को धार्मिक एवं सामाजिक संदेश दिया। रविदास जी की रचनाओं में ,उनके अंदर भगवान के प्रति प्रेम की झलक साफ दिखाई देती थी, वे अपनी रचनाओं के द्वारा दूसरों को भी परमेश्वर से प्रेम के बारे में बताते थे, और उनसे जुड़ने के लिए कहते थे। आम लोग उन्हें मसीहा मानते थे ,क्योंकि उन्होंने सामाजिक और आध्यात्मिक आवश्कताओ को पूरा करने के लिए बड़े -बड़े कार्य किये थे,कई लोग तो इन्हे भगवान की तरह पूजते थे,और आज भी पूजते है। 


रविदास जन्म के कारनै, होत न कोउ नीच।
नकर कूं नीच करि डारी है, ओछे करम की कीच। 

गुरु रविदास जी का जीवन-परिचय 

वैसे तो महान संत गुरु रविदास के जन्म से जुड़ी जानकारी सटीक नही मिलती है लेकिन साक्ष्यो और तथ्यों के आधार पर महान संत गुरु रविदास का जन्म 1377 के आसपास माना जाता है। हिन्दू धर्म महीने के अनुसार महान संत गुरु रविदास का जन्म माघ महीने के पूर्णिमा के दिन माना जाता है और इसी दिन हमारे देश में महान संत गुरु रविदास की जयंती बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। महान संत गुरु रविदास जिन्हे रैदास के नाम से भी जाना जाता है, उनके पिता का नाम संतोष दास और माता का नाम कलसा देवी था।  पिता संतोष दास जी जूते बनाने का काम करते थे , इसलिए रविदास जी भी उसी व्यवसाय से जुड़ गए।  रविदास जी को बचपन से ही साधू संतो के प्रभाव में रहना अच्छा लगता था जिसके कारण इनके व्यवहार में भक्ति की भावना बचपन से ही कूटकूट भरी हुई थी लेकिन रविदास जी भक्ति के साथ अपने काम पर विश्वास करते थे।


गुरु रविदास जी का स्वभाव कैसा था ?

रविदास जी हमेशा से ही जाति-पाती के भेदभाव के खिलाफ थे और जब भी मौका मिलता वे हमेशा सामाजिक कुरूतियो के खिलाफ हमेशा आवाज़ उठाते रहते थे।  रविदास जी के गुरु रामानन्द जी थे जिनके संत और भक्ति का प्रभाव रविदास जी के उपर पड़ा था,  इसी कारण रविदास जी को जब भी मौका मिलता वे भक्ति में तल्लीन हो जाते थे।  गुरु की भक्ति के कारण रविदास जी को पिताजी से बहुत डांट सुनना पड़ता था। ऐसा कितनी ही बार हुआ है कि रविदास जी अपने बनाये हुए जूते को किसी आवश्यक-मन को बिना मूल्य में ही दान दे दिया है और जिसके कारण इनका घर चलाना मुश्किल हो जाता था।  यंहा तक इन्ही कारणों से रविदास जी को अपने पिता से अलग होना पड़ा। अपने परिवार से अलग कर दिए जाने के बावजूद रविदास जी ने कभी भी भक्ति मार्ग को नही छोड़ा। रविदास जी जाति व्यवस्था के सबसे बड़े विरोधी थे उनका मानना था की मनुष्यों द्वारा जाति-पाती के चलते मनुष्य - मनुष्य से दूर होता जा रहा है,  और जिस जाति से मनुष्य मनुष्य में बँटवारा हो जाये तो फिर जाति का क्या लाभ ?


जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात।
रैदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जाति न जात।। 
रविदास जी के जीवन की छोटी - छोटी कहानियों से उनके समय , भक्ति और वचन के पालन सम्बन्धी गुणों का पता चलता है।  उनका एक मानना था की मन से कोई कार्य करना सबसे बड़ी भक्ति है।  एक बार पड़ोस के लोग किसी पर्व के अवसर पर गंगा स्नान के लिए जा रहे थे , लोगों ने रविदास जी से चलने का आग्रह किया तो रविदास जी ने बोला की चल तो सकता हूँ मैं लेकिन मेरा मन कार्य में लगा हुआ है ऐसे में अगर मैं गंगा स्नान के लिए जाऊंगा तो भी मेरा मन यही रहेगा तो मुझे पुण्य कैसे मिलेगा।  रविदास ने लोगों को एक सन्देश दिया की मन अन्तःकरण से जिस कार्य को करने के लिए तैयार हो वही कार्य करना चाहिए।  रविदास जी इसी व्यवहार से एक कहावत प्रचलित हो गयी की "मन चंगा तो कठोती में गंगा " ।

गुरु रविदास जी संत कैसे बने ?

गुरु रविदास जी का पूजा-पाठ और साधुओं की संगत में बहुत मन लगता था , उनके संपर्क में आने वाले लोग उनके व्यवहार के कारण उन्हें बहुत पसंद करते थे।  ज्ञानी जनों की संगत में रविदास जी बहुत सारा समय बिताते थे अपनी तरफ से जिसकी जितनी मदद कर सकते थे , वे करते थे। अपनी जूतों कि दुकान से लगातार मुफ्त में जूते चप्पलें जरुरत मंद लोगों को भेंट करने और अन्य सांसारिक गतिविधियों में लीन रहने के कारण रविदास जी के पिता ने एक दिन परेशान होकर उन्हें घर से निकाल दिया। पिता द्वारा घर से निकाले जाने के बाद रविदास जी ने अपने लिए कुटिया बनाई और जूतों चप्पलों का काम करने लगे ,अपने छोटे से व्यवसाय से जो आमदनी होती, उसी से गुजारा करते और साधु-संतों की संगत में रहते। इनके मृदु व्यवहार और ज्ञान के कारण लोगों का इनके पास जमावड़ा लगा रहता वह समाज में फैली बुराइयों,जाती-प्रथा,छुआछूत इत्यादि पर अपने दोहों, कविताओं के जरिए प्रहार किया करते थे। 

गुरु रविदास के संत बनने के पीछे एक कहानी प्रचलित है।  कहा जाता है की अक्सर रविदास जी अपने एक मित्र  के साथ खेल खेलते थे।  एक दिन वह मित्र खेलने नहीं आया तो रविदास जी उसके घर जा पहुंचे।  घर पहुंचकर देखा तो मित्र की मृत्यु हो चुकी थी  ,परिवार के सभी लोग विलाप कर रहे थे।  रविदास जी उस मित्र की लाश के पास जाकर जोर से झकझोर कर बोले "चलो उठो खेलने जाना है" और उनका मित्र उठ खड़ा हुआ और खेलने चले गया। ऐसा माना जाता है की रविदास जी के पास ईश्वर द्वारा प्राप्त अलौकिक शक्ति थी।  

कैसे मनाई जाती है रविदास गुरु जयंती ?

देश भर में माघ पूर्णिमा के अवसर पर संत रविदास जी का जन्म दिवस बहुत ही उत्साह के साथ मनाया जाता है इस दिन लोग कीर्तन जुलुस निकालते है। इस दौरान गीत-संगीत, गाने,दोहे सड़को पर बने मंदिरों में गाए जाते हैं संत रविदास जी के भक्त उनके जन्म दिवस के दिन घर या मंदिर में बनी उनकी छवी की पूजा करते हैं।



संत रविदास के जीवन से हमें कई शिक्षाए मिलती है संत रविदास ने अपने कार्य के प्रति समर्पण के चलते मनोरंजन के अवसर पर ध्यान नहीं दिया और वादे के अनुसार तय समय पर अपने ग्राहक को जूते तैयार करके दिए दूसरी बात यह है कि अगर हम मन लगाकर अपने कार्यों में मेहनत करते है, ईमानदारी,सच्चाई और सजन्नता से जीवन जीते है तो भगवान की कृपा हम सब पर सदैव बनी रहती है तभी तो माँ गंगा एक छोटी-सी कठोती में भी आ गई।




2 Comments

Thanks for your feedback !!!

Previous Post Next Post

Post Add1

After Post