सुखी रहने का तरीका

एक बार की बात है, एक महान एवं चर्चित संत अपने आश्रम में बैठे हुए थे। तभी उनका एक शिष्य, जो स्वाभाव से थोड़ा क्रोधी था उनके पास आया और बोला कि गुरूजी, आप कैसे अपना व्यवहार इतना मधुर बनाये रखते  हैं, ना आप किसी पे क्रोध करते हैं और ना ही किसी को कुछ भला-बुरा कहते हैं ? कृपया अपने इस अच्छे व्यवहार का रहस्य मुझे भी बताइए? मैं भी आपकी तरह शांत व्यवहार का बनना चाहता हूँ।

संत ने शिष्य की पूरी बात सुनी और बोले कि  "मुझे अपने रहस्य के बारे में तो नहीं पता, पर मैं तुम्हारा रहस्य जरूर जानता हूँ। "

शिष्य थोड़ा अचंभित हुआ और आश्चर्य से बोला - "मेरा रहस्य !!! वह क्या है गुरु जी?”

संत ने दुःखी स्वभाव बनाते हुए बोले कि "तुम अगले एक हफ्ते में मरने वाले हो!”

यह बात कोई और कहता तो शायद वह शिष्य न मानता लेकिन स्वयं गुरूजी ने कहा है तो जरूर ही ऐसा होगा। वह शिष्य उदास हो गया और गुरु का आशीर्वाद ले वहां से चला गया।

उस समय से उस शिष्य का स्वभाव बिलकुल बदल सा गया। वह हर किसी से प्रेम से मिलता और कभी भी किसी पे क्रोध न करता, अपना ज्यादातर समय ध्यान और पूजा में लगाता। वह उनके पास भी गया जिससे उसने कभी गलत व्यवहार भी किया था, और तो और  उनसे माफ़ी भी माँगा। 

देखते-देखते संत की भविष्यवाणी को एक हफ्ते पूरे होने को आये। शिष्य ने सोचा चलो एक आखिरी बार गुरु के दर्शन कर आशीर्वाद ले लेते हैं। सो  वह उनके समक्ष पहुंचा और बोला कि हे गुरुजी अब मेरा समय पूरा होने वाला है, कृपया मुझे आशीर्वाद दीजिये।

संत (गुरु जी ) ने बोला कि मेरा आशीर्वाद हमेशा तुम्हारे साथ है पुत्र। अच्छा, ये बताओ कि पिछले सात दिन कैसे बीते? क्या तुम पहले की तरह ही लोगों से नाराज हुए, गुस्सा  किये या  उन्हें अपशब्द कहे?

शिष्य ने बड़े नम्रता पूर्वक जवाब दिया - "नहीं-नहीं गुरु जी  बिलकुल नहीं। मेरे पास जीने के लिए सिर्फ सात दिन थे, मैं इसे बेकार की बातों में कैसे गँवा सकता था। मैं तो सबसे प्रेम से मिला, और जिन लोगों का कभी दिल दुखाया था उनसे क्षमा भी मांगी" ।

गुर्रूजी मुस्कुराए और बोले, “बस यही तो मेरे अच्छे व्यवहार का रहस्य है। मैं जानता हूँ कि मैं कभी भी मर सकता हूँ, इसलिए मैं हर किसी से प्रेमपूर्ण व्यवहार करता हूँ "।

वह शिष्य समझ गया कि संत गुरु  ने उसे जीवन का यह पाठ पढ़ाने के लिए ही मृत्यु का भय दिखाया था।

सारांश :-  दोस्तों वास्तव में हमारे पास भी सात दिन ही बचें हैं। रवि, सोम, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि, आठवां दिन तो बना ही नहीं है। अर्थात हमे भी इन्ही सातों दिन के अंदर ही मृत्यु को प्राप्त होना है। और जब मृत्यु आनी ही है तो क्यों किसी से नफरत करना और किसके लिए करना। 


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