आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु हैं ।

एक बहुत ही बड़े एवं प्रतिष्ठित प्रतापी गुरु थे जो अपने सभी शिष्यों से बहुत प्रेम करते थे। अपने शिष्यों के हर गुणों ,अवगुणो और कमियों के बारे में पता कर के  उन्हें भविष्य के लिए तैयार किया करते थे। उनका एक मात्र लक्ष्य था कि उनका हर एक शिष्य जीवन के हर पड़ाव पर हिम्मत से आगे बढ़े एवं सफलता को प्राप्त करे। वैसे तो उनके सभी शिष्य बहुत होशियार और चालाक थे , परन्तु उनके सभी शिष्यों में एक शिष्य बहुत ही भोला था। स्वभाव का बड़ा ही कोमल और सरल विचारों वाला था, लेकिन वह बहुत ज्यादा आलसी था। 


वह इतना आलसी हो गया था कि, आलस के कारण उसे कुछ भी पाने का मन नहीं था।  वो बिना कर्म के मिलने वाले फल में ज्यादा रूचि रखता था।  उसका यह अवगुण गुरु को बहुत परेशान कर रहा था और वे दिन रात अपने उसी शिष्य के विषय में सोचते रहते थे।

एक दिन उस प्रतापी गुरु ने पारस पत्थर की कहानी अपने सभी शिष्यों को सुनाई। गुरु जी कहानी सुना रहे थे और गौर भी कर रहे थे कि इस पत्थर के बारे में जानने के लिए सबसे अधिक जिज्ञासु कौन है। उन्होंने देखा कि वही आलसी शिष्य बड़े जिज्ञासा के साथ कहानी को सुन रहा था। यह देख गुरु उसकी मंशा समझ गये।  वे समझ गये कि यह आलसी हैं, इसलिए उसे इस जादुई पत्थर की लालसा हैं। लेकिन ये मुर्ख यह नहीं जानता कि जो व्यक्ति कर्महीन होता हैं उसकी सहायता तो स्वयं भगवान् भी नहीं कर सकते और ये तो बस एक साधारण सा पत्थर हैं। 

यह सोचते- सोचते गुरु ने सोचा कि यही सही वक्त हैं इस शिष्य को आलसी के अवगुणों से अवगत कराने का। फिर क्या गुरु जी ने उस शिष्य को अपनी कुटिया में बुलवाया। कुछ क्षण बाद, कुटिया के भीतर शिष्य ने प्रवेश किया और गुरु को सिर झुकाकर प्रणाम किया।

गुरु ने आशीर्वाद देते हुए कहा – बेटा ! मैंने आज जिस पारस पत्थर की कहानी सुनाई वो पत्थर मेरे पास हैं और तुम मेरे सबसे प्रिय शिष्य हो इसलिए मैं वो पत्थर सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक के लिए तुम्हे देना चाहता हूँ।  तुम उससे जो करना चाहों कर सकते हो , तुम्हे जीतना स्वर्ण चाहिये तुम इस पत्थर से इस दिए गये समय में बना सकते हो। यह सुनकर शिष्य की ख़ुशी का ठिकाना न रहा। गुरु जी ने उसे प्रातः सूर्योदय होने पर पत्थर को ले जाने को कहा। अब पूरी रात उस शिष्य को उस पत्थर को लेकर व्याकुलता बनी रही , सारी रात बड़े -बड़े सपने देखने लगा , अपनी आकांछाओं और सुबिधाओं को कैसे पूरा करेगा इसके बारे में सोचने लगा। 

दुसरे दिन प्रातः भोरकाल में  शिष्य ने गुरु जी से पत्थर लिया और सोचने लगा कि कितना स्वर्ण मेरे जीवन के लिए काफी होगा ? मैं अपना मकान कैसे बनवाऊँ कि लोग देखते रह जाएँ ,और इसी चिंतन में उसने आधा दिन निकाल दिया।  भोजन करने का समय आ गया , और भोजन कर वो अपने कक्ष में आया। उस वक्त भी वह उसी चिंतन में था कि कितना स्वर्ण जीवनव्यापन के लिए पर्याप्त होगा और यह सोचते-सोचते आदतानुसार भोजन के बाद उसकी आँख लग गई और जब खुली तब दिन ढलने को था और गुरूजी के वापस आने का समय हो चूका था। 

उसे फिर कुछ समझ नहीं आया, वह कुछ भी तय नहीं कर पा रहा था कि इतने में गुरु जी वापस आ गये और उन्होंने पत्थर वापस ले लिया।  शिष्य ने बहुत विनती की लेकिन गुरु जी ने एक ना सुनी।  तब गुरु जी ने शिष्य को समझाया पुत्र ! आलस्य व्यक्ति की समझ पर लगा ताला हैं।

आलस के कारण तुम इतने महान अवसर का लाभ भी ना उठ सके, जो व्यक्ति कर्म से भागता हैं उसकी किस्मत कभी उसका साथ नहीं देती। तुम एक अच्छे शिष्य हो परन्तु तुममे बहुत आलस हैं।  जिस दिन तुम इस आलस के चोले को निकाल फेकोगे। उस दिन तुम्हारे पास कई पारस के पत्थर होंगे।

शिष्य को गुरु की यह बात समझ आ गई और उसने खुद को पूरी तरह बदल दिया , अब उसे कभी किसी पारस की लालसा नहीं रही।

दोस्तों यह एक काल्पनिक कहानी है , जिसका सारांश यही है कि हमे अपनी किश्मत से ज्यादा अपने कर्म पर विश्वास करना चाहिए। बिना कर्म किये हम कुछ भी हासिल नहीं कर सकते। 

आपको एक कहानी कैसी लगी , comments के माध्यम से जरूर बतायें। 

धन्यवाद !!!

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