प्रेम की जीत। हिंदी कहानी। Hindi Motivational Story 2020

प्रेम की जीत। हिंदी कहानी। Hindi Motivational Story 2020

एक बार एक राजा एक बड़े जंगल में शिकार करने के लिए गया। शिकार करते हुए उसने ऐसे पांच जंगली और अड़ियल घोड़े पकड़े जिन्हे काबू में करना मुश्किल था।  राजा ने उन घोड़ों को वर्ष भर खूब खिलाया-पिलाया और उनसे कोई काम भी नहीं लिया इसलिए वे घोड़े बहुत शक्तिशाली और बहुत खतरनाक हो गये। उन्हें अस्तबल से भी निकालना कठिन हो गया था । यंहा तक कि उनके पास जाना भी खतरे से खाली नहीं था। 

जब राजा ने  घोड़ों की यह स्तिथी देखी तब उसने राज्य में घोषणा की कि जो पांच व्यक्ति उन घोड़ों पर सवारी करेंगे, उन्हें वह सम्मानित करेगा और अपनी सेना में उच्च पदों पर चयन भी करेगा।  और तो और जो कोई उनमें से  प्रथम आयेगा, उसे वह अपनी घुड़सवार सेना का सेनापति भी बनायेगा।


राजा का यह घोषणा सुनकर हर कोई उत्साहित हुआ परन्तु किसी की भी हिम्मत नहीं हुयी की घोड़ों के पास जाया जाये।  बहुत लोग तो उन घोड़ों को दूर से ही देखकर ही वापिस लौट गये। परन्तु उसी राज्य में पांच ऐसे भी बहादुर व्यक्ती थे जिन्होंने घोड़ों को अपने वश में करकर सवारी करने की हिम्मत जताई। 

अब उन पांच बहादुरों के सामने शर्त रखी गयी की , जो बहादुर अपने - अपने घोड़े को लेकर राज्य के अंतिम छोर पर बने किले पर अगले पांच दिन तक घोड़ों की सवारी करते हुए पहुंचेगा , उसे विजयी माना जाएगा और यह समझ लिया जायेगा की उसने उस घोड़े को जीत  लिया है।  

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अब नियत दिन पर उन घोड़ों को अस्तबल से बाहर निकाला गया और एक -एक घोड़े की लगाम को उन पाँचों बहादुरों के हाथों थमा दिया गया।  हजारों लोगों की भीड़ इकट्ठा हो गयी थी यह स्पर्धा देखने के लिए ।  जैसे ही घोड़ों की लगाम उन पाँचों के हाथों में आयी , सभी घोड़े अपने मन  के हो गए और यंहा वंहा भागने कूदने लगे।  ऐसा तनिक भी प्रतीत नहीं  हो रहा था कि वे बहादुर उन घोड़ों को अपने वश में कर पाएंगे अथवा उन पर सवारी कर पाएंगे। किसी तरह उन बहादुरों ने अपने - अपने घोड़े को लेकर गंतव्य स्थान की तरफ निकल गए।  

 शत्रु को अस्वीकार किया जा सकता है परंतु मित्र को अस्वीकार करना मुश्किल था।

अब क्या दिन बीता नहीं की एक घुड़सवार लहू लुहान होते हुए लौटा , थोड़ी देर बाद दूसरा , तीसरा और चौथा भी लौट आया। चारो बुरी तरह से जख्मी थे और  घोड़े भी घायल थे।  परन्तु पांचवा घुड़सवार नहीं लौटा। राजा और राज्य की प्रजा चिंतित होने लगी। पांचवे घुड़सवार का कोई अता - पता नहीं था। राज्य की  प्रजा एवं राजा ने  यह सोच लिया कि कंही पांचवा घुड़सवार मृत्यु को तो प्राप्त नहीं  हो गया। परंतु ठीक पांचवे दिन वह घुड़सवार अपने घोड़े पर बैठकर गुनगुनाता हुआ चला आ रहा था।  सब यह देखकर आश्चर्यचकित हो  रहे थे कि कैसे यह घुड़सवार इस अड़ियल घोड़े  पर बैठकर गीत गा रहा है।  

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राजा ने उस घुड़सवार से कहा कि "तुम अकेले ही ऐसे सवार हो जिसने सफलता पूर्वक घोड़े पर सवारी की और सही सलामत रहे।  क्या मैं जान सकता हूँ कि तुमने ऐसा क्या किया कि घोडा तुम्हे अपना सवार बनने दिया ?" 

उस घुड़सवार  ने उत्तर दिया कि "वह चार दिन तक केवल घोड़े की पीठ का साथी रहा। उसने सवार बनने की नहीं, साथी बनने की कोशिश की। उसने घोड़े की लगाम को छुआ भी नहीं। उसने उसे कोई दिशा नहीं दी। उसने उसे कोई इशारा तक नहीं किया। वह उसके ऊपर था पर बिल्कुल अनुपस्थित था। उसने उसे पता भी नहीं चलने दिया कि वह है। घोड़ा मुक्त था और सवार केवल नाममात्र  था। घोड़ा जब थक जाता, वह उसे विश्राम देता, उसके लिये भोजन और छाया की व्यवस्था करता। वह जब फिर भागने को उत्सुक होता, वह चुपचाप उसकी पीठ पर हो जाता, लेकिन ऐसे जैसे कि कोई पीठ पर नहीं है। और इस तरह  घोड़ा चार दिन में मित्र हो गया, विनीत हो गया। प्रेम से जीत हो गई थी और पराया अपना हो गया था। वह शत्रु नहीं रहा, मित्र हो गया। शत्रु को अस्वीकार किया जा सकता है परंतु मित्र को अस्वीकार करना मुश्किल था।"

राजा ने यह सुनकर बहुत खुश हुआ एवं अपनी घोषणा के अनुसार उसे अपनी सेना का सेनापति नियुक्ति कर दिया। 

दोस्तों इस कहानी का यही सारांश है कि हम प्यार से , प्रेम से किसी को भी अपने वश में कर सकते हैं, एवं जीता जा सकता है ।  


 धन्यवाद !!!!


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