Yah ghar tumhara nahi , mera ghar hai - Hindi Story | यह घर तुम्हारा नही ,मेरा घर है।

Yah ghar tumhara nahi , mera ghar hai - Hindi Story | यह घर तुम्हारा नही ,मेरा घर है। 

राधा अभी घर में पोछा मार के ही बैठी थी की ससुर श्याम लाल अपने चप्पलों के निशान फर्श पर छोड़ दिए। यह देख कर बहु राधा को अच्छा नहीं लगा ,इसलिए वह बोल पड़ी " उफ़ ! पापा जी , आपने पूरा घर ही गंदा कर दिया" . बहु के इस तरह के बोल को सुनकर श्याम लाल हतप्रभ होकर खड़े रह गए। एक समय था जब श्याम लाल पुलिस की नौकरी किया करते थे और तब बड़े से बड़े मुजरिम भी उनके सामने दुम हिलाते थे। तब की बात कुछ और ही थी , पर आज रिटायरमेंट के बाद वह बात नहीं रही। यह बात अब श्याम लाल को भी पता चल चूका था।

Yah ghar tumhara nahi , mera ghar hai - Hindi Story | यह घर तुम्हारा नही ,मेरा घर है।



श्यामलाल खड़े ही थे की पत्नी ने आवाज देकर आपने पास बुलाया, और सोफे पर बैठाते हुए कहा कि "कोई बात नहीं जी, बहू की बातों का क्या बुरा मानना? बस जुबान की तेज है, बाकी उसके मन में ऐसा कुछ नहीं है"।


श्यामलाल ने पत्नी की आंखों में देखा और जैसे वे पूछ रहे हों " सच में " ? और हल्की से मुस्कान , हल्की सी सोच लिए बैठे रहे। पत्नी ने तुरंत कॉफी बनाकर लाया और दोनों आपस में बातचीत करते हुए , पुरानी यादों को ताजा करने लगे।


पत्नी को पता था कि पति को जब गुस्सा या ज्यादा किसी बात की चिंता होती थी तो कैसे उन्हें शांत करना है। वह अपने पति श्याम लाल को बहुत अच्छे से जानती थीं। वह जानती थीं कि वो अभी गुस्से में थे और उनके हाथ की कॉफी पीकर उनका गुस्सा शांत हो जाता है। पत्नी भी क्या करतीं, पति और बेटे मोहित के मोह में फंसी एक भारतीय नारी जो ठहरी। दोनों तरफ़ बैलेंस बनाते बनाते ही उनका जीवन कट रहा था, कभी बेटे की सुनती तो कभी पति की, पर शिकायत कभी नहीं करती।

एक दिन की बात है सुबह - सुबह श्याम लाल सैर से लौटने के बाद अपनी पत्नी के साथ लॉन में बैठे थे तभी नौकर ने तीन कप चाय रख दिए। तीन कप चाय देखकर पति - पत्नी एक दूसरे को देखने लगे कि ये तीसरा कप चाय किसके लिए है ? हम दो के आलावा तो कोई कभी हमारे साथ चाय पिता नहीं है ? बेटे मोहित को भी माँ - बाप के साथ चाय पीकर जमाना हो गया था।


तभी मोहित वहाँ आ बैठा, साथ में चाय पीने लगा। लेकिन अजीब सी चुप्पी, ये वही मोहित है जो छोटा था तो उसकी बातें ख़त्म ही नहीं होती थीं। श्याम लाल जी कितना भी थके हों लेकिन दोनों एक दूसरे के साथ खेलते ही थे। उसकी बातें तब तक ख़त्म नहीं होतीं जब तक कि वो उन्हे कहते कहते थक के सो नहीं जाता। आज अजीब सी औपचारिकता ने अपनी जगह बना ली थी बेटे और पिता के बीच।


तभी पत्नी ने उस खामोशी को तोड़ा और बोली , मोहित अगले महीने ही तो राधा के भाई की शादी है ना ?

मोहित बोला - "हाँ माँ, उसी के बारें में बात करने आया हूँ। लड़की वाले इसी शहर के हैं और वो यहीं से शादी करना चाहते हैं। सो राधा का परिवार शादी के लिए ये घर चाहता है। वो हमारे घर से शादी करना चाहते हैं, इसलिए मैं चाहता हूँ कि जब तक भीड़ भाड़ रहेगी घर में तब तक आप दोनों दीदी के पास चले जाओ। आप दोनों को भी भीड़ भाड़ से असुविधा होगी और दीदी भी इसी शहर में हैं तो आप लोगों को कोई तकलीफ़ भी नहीं होगी। आप दोनों का कमरा भी उनके काम आ जाएगा"।


मोहित की बाते सुनकर श्याम लाल जी गुस्से से लाल हो गए, फ़िर भी अपनी आवाज को संयमित करके बोले "बहू के घर वालों को दूसरा घर दिला दो किराए पर, दस पंद्रह दिनों के लिए। हम क्यों शिफ्ट हों कहीं "?


मोहित बोला "पापा आप भी ना गजब करते हो, राधा के घर वाले हैं , हमारे इतने बड़े घर के रहते उनके लिए दूसरा घर देखें! अब राधा ने उनसे कह भी दिया है। अब आप लोग अपना देख लो वो यहीं आएंगे।


इतना कह कर मोहित एक दम से अंदर चला गया। अंदर से बहू राधा की आवाज भी आने लगी , लग रहा था कि वो सब कुछ सुन रही थी और उसे ससुर जी की बात शायद अच्छी नहीं लगी थी। 




श्याम लाल ने देखा , आज पत्नी की आँखों से आँसू बह रहे थे। इसलिए उन्होंने अपना कंधा दिया, जैसे कह रहे थे कि अभी मैं हूँ, सब ठीक कर दूँगा।


दूसरे दिन शाम श्याम लाल जी सैर से आए तो पत्नी ने बताया कि बेटा और बहू , बच्चों के साथ छुट्टी बिताने अपने ससुराल गए हैं ।


श्याम लाल जी मुस्कुराने लगे और पत्नी से बोले "देख पगली, यही बच्चे होते जिनके लिए तू मुझसे लड़ती थी, जिनके लिए जाने कितनी रातें हमने जाग के बीता दीं। आज वो हमारे घर से हमें ही जाने को कह रहे हैं। कोई बात नहीं, मै भी इनका बाप हूँ" कहकर अंदर चले गए।


एक हफ़्ते बाद मोहित परिवार के साथ लौटा तो दरवाजे पर ताला लगा था। चौकीदार बैठा उन्हे देखते ही उनके पास पहुँचा एक चाभी मोहित के हाथों में दी और एक चिठ्ठी भी।


मोहित चिठ्ठी खोल कर पढ़ने लगा, वो ख़त श्याम लाल जी का था जी की मोहित के नाम से था।


प्रिय बेटा मोहित ,


मैं और तुम्हारी माँ रामेश्वरम जा रहे हैं। एक महीने बाद लौटेंगे, ये जो चाभी है तुम्हारे हाथ में वो घर की चाभी नहीं है। वो एक दूसरे फ्लैट की चाभी है जिसमें तुम सभी का सामान रखवा दिया है। वो फ्लैट मैंने बहुत पहले खरीदा था, तुम्हें नहीं बताया था। पॉश इलाके में है तुम लोगों के लिए अच्छा है, अगर अच्छा ना लगे तो अपने हिसाब से घर ले लेना।


यह घर मेरा और तुम्हारी माँ का है और हमारा ही रहेगा, इसमें से हमें कोई नहीं निकाल सकता। अभी तक सब कुछ बर्दाश्त करता रहा था क्योंकि तुम्हारी माँ खुश थी लेकिन अब तुम्हारी बातों से उसकी आँखों में आँसू आए ये मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता।


ये हमारा सपनों का घर है जिसमें हम अपने बच्चों और नाती पोतों के साथ रहना चाहते थे, लेकिन शायद ईश्वर को ये मंजूर नहीं था और तुम लोगों को हमारा साथ पसंद नहीं था। नया घर मेरे और तुम्हारी माँ की तरफ़ से तुम लोगों के लिए आशीर्वाद स्वरूप है। इच्छा होगी तो रखना वरना वापस कर देना। माता पिता होने के नाते हम अपना आत्मसम्मान नहीं खो सकते।


हमारे बाद ये घर ट्रस्ट का होगा जो यहाँ वृद्ध आश्रम बनाएगे। इस घर पर तुम्हारा या तुम्हारी बहन का कोई अधिकार नहीं होगा, मैंने यह बात तुम्हारी बहन को भी बता दी है और वो मेरे इस फैसले से खुश है, उम्मीद है तुम भी होगे।


तुम सब खुश रहो,तुम्हारा पिता।




ख़त खत्म होते ही मोहित एकदम सा जड़ हो चुका था। आँखों में आँसू थे, लेकिन ये पता नहीं कि वो आँसू पश्चाताप के थे या बड़े से घर को खोने का या फिर इस एहसास के टूटने का कि पिता की जायदाद अन्त में बेटे की ही होती है।



दोस्तों कहानी का सारांश तो आपको पता चल ही गया होगा। कहानी कैसी लगी , अपने कमैंट्स के माध्यम से जरूर बताएं।

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