Success Story of IAS officer Ummul Kher | उम्मुल खेर के IAS बनने तक की संघर्ष भरी कहानी .

उम्मुल खेर एक ऐसी शख्शियत है जिसने अपने जीवन में आने वाले सभी उतार - चढ़ाव को पीछे छोड़कर आगे बढ़ने में कोई कसर नहीं छोड़ा. अनेकों परेशानी होने के बाद भी इन्होंने IAS बनने के सपने को पूरा कर दिखाया. उन्होंने अपने कैरियर के बीच में अपनी ख़राब आर्थिक परिस्थितियों को आड़े नहीं आने दिया. उम्मुल के शरीर में 16 फैक्चर और 8 सर्जरी होने के बावजूद भी, उसने IAS बनने के सपने को सच किया. दोस्तों यह कहानी उन सभी युवाओं के लिए है , जो अपनी गरीबी , आर्थिक स्थिति , अथवा शारीरिक क्षमता का रोना रोते रहते हैं .





जीवन परिचय :

उम्मुल खेर राजस्थान की रहने वाली हैं, ये दिव्यांग महिला है (दिव्यांग ही पैदा हुई थी ). उम्मुल खेर बोन फ्रेजाइल डिसॉर्डर ( BONE FRAZALE DESEASE) नामक रोग से पीड़ित है. इन्होने अपने जीवन में आईएएस बनने तक, बहुत सारी कठिनाइयों का सामना किया हैं. उम्मुल मूल रूप से राजस्थान के पाली मारवाड़ की रहने वाली है. वो एक बहुत ही गरीब परिवार से थी, उनका बचपन बहुत गरीबी और बीमारी में बीता हैं. इनके परिवार में इतनी समस्या होने के बावजूद भी उम्मुल ने अपना हौसला नहीं छोड़ा.


नाम : उम्मुल खेर
जन्म तारीख : ?
जन्म स्थान : फाप -मारवाड़ ,राजस्थान ,भारत
पिता का नाम : ?
माता का नाम :?
भाई व् बहन : ?
पति : अविवाहित
नागरिकता :भारतीय
धर्म : इस्लाम (मुस्लिम )
जाति :पता नही
उम्र : 28 वर्ष
शिक्षा : अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में परानास्ताक
पेशा : आईएएस ऑफिसर
महत्वपूर्ण उपलब्धि : मात्र 28 साल की उम्र में , प्रथम प्रयास में IAS बनना .



एक प्रचलित कहावत है कि - मन के हारे ,हार है मन के जीते जीत.
अगर मन हार गया तो हम कुछ नहीं कर सकते और अगर मन ने ठान लिया तो उसे पूरा करने से कोई रोक भी नहीं सकता हैं. जैसा की उम्मुल ने अपने मन की सुनी और अपने मन का काम किया.



संघर्ष की कहानी :

उम्मुल खेर जब पांच साल की थी तभी घर की समस्या इतनी बढ़ गयी थी कि उनके घर में दो समय का खाना भी बड़ी मुश्किल से मिल पाता था.


उम्मुल खेर का जन्म राजस्थान में एक गरीब मुस्लिम परिवार में हुआ था. जब वह बहुत छोटी थी , उनकी माँ की तबियत बहुत ख़राब रहा करती थी और बाद में इसी दौरान माँ की मृत्यु हो जाती है. उम्मुल मात्र 5 साल की उम्र में अपने पिता जी के पास दिल्ली रहने आ गयी. यंहा आकर उसे पता चला कि उनके पिता ने दूसरी शादी कर ली है. सौतेली माँ का व्यवहार कुछ अच्छा नहीं रहता था लेकिन कुछ किया नहीं जा सकता था. पिताजी दिल्ली के झुग्गी - झोपड़ियों में रहते थे और निजामुद्दीन इलाके में रेहड़ी पर कपड़े बेचा करते थे. उनका घर बॉस और फट्टियो से बना हुआ था ,उनके घर का फर्श भी कच्चा था , और बारिश में घर के छत्ते से पानी भी टपकता था. ऐसे परिस्थिति में रहने वाली उम्मुल खेर ने 5वीं क्लास तक की पढ़ाई , दिल्ली के आईटीओ में विकलांग बच्चों के स्कूल में किया.


एक समय ऐसा भी आया कि उनकी झुग्गियों को तोड़ दिया गया और ये लोग बेघर हो गए ,तब वहाँ से निकलकर पूरा परिवार त्रिलोकपुरी आ गए और किराये पर मकान लेकर रहने लगे. यंहा आकर उम्मुल ने बच्चो को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया था. उस समय उम्मुल एक बच्चे का फीस 50 रूपये ही लेती थी. जिस समय वो ट्यूशन पड़ाना शुरू की थी , उस समय उम्मुल कक्षा 7वीं में पढ़ती थी . जब उम्मुल 8वीं कक्षा में गयी तब इनके घर वालो ने कहा कि "अब आगे पढ़ने की जरुरत नहीं है तुम्हारे पैर ख़राब हैं तो तुम्हे सिलाई - कड़ाई का काम करना चाहिए".
उस समय उनकी अपनी सगी माँ भी नहीं थी ,उनकी सौतेली माँ थी और उनका दुःख भी कोई बाटने वाला नहीं था.


उम्मुल ने अपनी शिक्षा किस तरह पूर्ण किया :

जब उनके घर वालो ने उन्हें आगे की पढ़ाई करने से मना किया तब उम्मुल ने अपना घर छोड़ दिया और अलग से किराये के मकान में रहने लगी. वहीं से अपनी आगे की पढ़ाई पूरा करने का फैसला लिया. उम्मुल सुबह अपने स्कूल जाती थी और स्कूल से आने के बाद बच्चो को ट्यूशन पड़ती थीं. और इन्होने ट्यूशन के पैसे से आगे की पढ़ाई करने का फैसला लिया .


जब उम्मुल 10वीं कक्षा में तब उन्हें चेरिटेबल ट्रस्ट से स्कालरशिप मिला और उसी पैसे से उन्होंने 12वीं की पढ़ाई भी किया और उम्होंने 12वीं में 89% लाकर टॉप किया. इसके बाद उम्मुल ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के गार्गी कॉलेज से साइकोलॉजी से अपना दाखिला करवाया. उन्हें यूनिवर्सिटी आने के लिए बस के धक्के खाने पड़ते थे ,बड़ी ही मुस्किलो का सामना करना पड़ता था, तब वो यूनिवर्सिटी आती थी.


वहा से उन्होंने अपना ग्रेजुएशन पूरा किया. उम्मुल ने पोस्ट ग्रेजुएशन के लिए जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में आवेदन कर पढ़ाई शुरू किया. यही से उन्होंने एमफिल का आवेदन किया और 2014 में उम्मुल को जापान के इंटरनेशनल लीडरशिप के ट्रेनिंग प्रोग्राम के लिए चुना गया. उम्मुल ऐसी चौथी भारतीय थी. इसके बाद से इनकी पैसे की समस्या कम होने लगी.




इन्होने पहले ही प्रयास में आईएएस की परीक्षा कैसे पास किया :

JRF करने के साथ - साथ उम्मुल ने आईएएस (IAS) की तैयारी भी शुरू कर दिया. उन्होंने अपना सारा समय केवल शिक्षा में ही लगाया. वो अपनी पढ़ाई मेहनत और लगन के साथ करती थी. उम्मुल अपने पढ़ाई के लिए समय बचने के तीन दिनो की बासी रोटी भी खाती थी, ताकि जो समय वो खाना बनाने में लगाती हैं , वही समय वो अपने पढ़ाई में लगा सके.


उम्मुल ऐसा इसलिये भी करती थी कि वो एक विकलांग थी , जिनकी हड्डिया कमजोर थी जिसके कारण उन्हें सीढ़िया चढ़ने - उतरने में कठिनाई होती थी. अगर वो कंही आती - जाती थी तो उन्हें अपने आप को बहुत संभालना पड़ता था. इसलिए वो कंही भी आना - जाना सही नहीं समझती थी और अपना सारा समय पढ़ाई में लगाती थी. उनके इसी प्रयास के कारण उन्होंने पहले ही प्रयास में UPSC की कठिन परीक्षा को 420 वीं रैंक के साथ हासिल किया. आज वो एक आईएएस ऑफिसर बन गयी है जो करोड़ो लोगो की प्रेरणा बन गयी है. उम्मुल खेर ने एक नया इतिहास रच दिया है.




उम्मुल के हौसले और जज्बे को नमन करते है. उम्मुल ने आज एक नया इतिहास रचा है , जो लोग अपने आपको कमजोर और असहाय समझते रहे हैं , उन सभी के जीवन में आज ये नए हौसलें लेकर आयी है. जीवन जीने के लिए लिए एक रास्ता दिखाया है .


दोस्तों याद रहे , अगर मन में कुछ करने की ठान लिया तो कोई भी हमें हरा नहीं सकता, जिस तरह उम्मुल खेर ने अपने आप को हारने नहीं दिया. 



जीवन एक बार मिलता है उसे सही दिशा में जीने की राह दिखाया है उम्मुल खेर ने।





उम्मुल के इस कामयाबी के लिए कुछ कविताएँ :



मुट्ठी में कुछ सपने लेकर ,भर कर जेबो में आशाएं,
दिल में है अरमान यही , कुछ कर जाये -कुछ कर जाये।


सूरज सा तेज नहीं मुझमे , दीपक सा जलते देखोगे,
अपनी हद रौशन करने से , तुम मुझको कब तक रोकोगे।


मैं उस माटी का वृक्ष नहीं ,जिसको नदियों ने सींचा है,
बंजर माटी में पालकर मैंने ,मृत्यु से जीवन खींचा हैं।


मैं पत्थर पर लिखी इबारत हूँ , शीशे से कब तक तोड़ोगे ,
मिटने वाला मैं नाम नहीं , तमु मुझको कब तक रोकोगे।


इस जग में जितने जुल्म नहीं , उतने सहने की ताकत हैं ,
तानो की शोर में रहकर भी ,सच कहने की आदत हैं।


मैं सागर से भी गहरा हूँ , तुम कितने कंकड़ फेंकोगे ,
चुन -चुन कर आगे बढूँगा मैं ,तुम मुझको कब तक रोकोगे।


झुक -झुक कर सीधा खड़ा हुआ , अब फिर झुकाने का शौक नहीं ,
अपने हाथों ही रचा स्वयं ,तुमसे मिटने का खौफ नहीं,


तुम हालातो की भट्टी में , जब -जब भी मुझको झोकोगे ,
तप -तप कर सोना बनूगा मैं , तुम मुझको कब तक रोकोगे।




दूसरी कविता :


लहरों से डर कर नौका पर नहीं होती ,
कोशिश करने वालो की कभी हार नहीं होती,
नन्ही चींटी जब दाना लेकर चलती हैं ,
चढ़ती दीवारों पर सौ - बार फिसलती हैं.


मन का विश्वास रगो में सांस भरता है ,
चढ़ कर गिरना ,गिरकर चढ़ना न अखरता है ,
आखिर उसकी मेहनत बेकार नहीं जाती ,
कोशिश करने वालो की कभी हार नहीं होती।।


डुबकिया सिंधु में गोताखोर लगता है ,
जा जाकर खाली हाथ लौटकर आता है,
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में ,
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती।
कोशिश करने वालो की कभी हर नहीं होती।।


असफलता एक चुनौती है इसे स्वीकार करो ,
क्या कमी रह गयी है देखो और सुधार करो।
जब तक ना सफल हो नींद चैन को त्यागो तुम ,
संघर्ष का मैदान छोड़कर मत भागो तुम।
कुछ किये बिना ही जय -जयकार नहीं होती ,
कोशिश करने वालो की कभी हर नहीं होती


दोस्तों , उपर्युक्त लेख आपको कैसा लगा , हमे जरूर बताएं। धन्यवाद !!!

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